राणा प्रताप : सामाजिक न्याय और साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रतीक

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स्वाभिमानी प्रताप ने अकबर की साम्राज्यवादी नीति के विरुद्ध सीमित संसाधनों से संघर्ष किया। प्रताप न केवल सामाजिक न्याय के आदर्श हैं बल्कि साम्प्रदायिक सौहार्द के भारतीय प्रतीक भी हैं।

प्रताप के संघर्ष और हल्दीघाटी को यूं समझ सकते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद प्रताप ने अपने सहयोगियों को स्वाभिमान की भावना से इतना प्रेरित किया कि वे साम्राज्य विस्तार में लगे अपने से कई गुना बड़ी अकबर की फौज के विरुद्ध आखरी दम तक लड़े।

प्रताप ने अपने सेनापति के चयन में अपने भाई-बंधुओं की बजाय मुस्लिम पठान योद्धा हाकिम खान सूर पर भरोसा किया, जिनके नेतृत्व में प्रताप की सेना ने मानसिंह के नेतृत्व वाली मुगलिया फौज से लौहा लिया।

हाकिम खान प्रताप के भरोसे पर खरे उतरे और हल्दीघाटी में अपने पराक्रम का लोहा मनवाया। उनकी वीरता की मिसाल इससे मिलती है कि हल्दीघाटी में हाकिम खान की दो जगह मजारें हैं, एक वहां जहां उनका सर गिरा दूसरी वहां जहां सर काटने के बाद भी लड़ते हुए उनका धड़ गिरा।

बहुत कम लोग जानते होंगे कि प्रताप के ग्यारह भाइयों में से नो इस जंग में अकबर की ओर से लड़े यानी केवल दो भाई प्रताप के साथ थे, शेष प्रताप के विरुद्ध।

प्रताप के साथ इस जंग में बहुसंख्यक दलित आदिवासी योद्धा साथ थे। दलित गाड़िया लुहार और आदिवासी भील गरासियों ने राजपूत योद्धाओ के साथ अपने पराक्रम का लोहा मनवाया। राणा पुंजा भील जैसे अनेक वीर दलित आदिवासी इस युद्ध मे काम आए। हल्दीघाटी का संघर्ष इन दलित आदिवासियों के शौर्य की कहानी भी बताता है। भारतीय इतिहास में प्रताप के इस सामाजिक न्याय और साम्प्रदायिक सौहार्द वाले स्वरूप के साथ कभी न्याय नही हुआ।
सादर।


-सुरेन्द्रसिंह शेखावत
सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता

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