महाजन तोपाभ्यास क्षेत्र के 34 गांवों का किसान संघर्ष

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भूमि के बदले भूमि दो की मांग स्वीकार

लूनकरणसर तहसील के महाजन तोपाभ्यास क्षेत्र के लिए 34 गांवों की भूमि अवाप्ति सन् 1983 में राजस्थान भूमि अवाप्ति अधिनियम की धारा 4 के तहत जारी नोटिफिकेशन 02.11.83 से शुरू हुई। राजस्थान भूमि अवाप्ति अधिनियम की धारा 6 सहपठित धारा 17 राजस्थान भूमि अवाप्ति अधिनियम, 1953 के तहत गजट विज्ञप्ति इसके 16 महीने बाद 20.03.1985 को जारी की गई।
उक्त अवाप्ति के विरुद्ध महाजन तोपाभ्यास क्षेत्र के 34 गांवों के किसानों का सन् 1982 से शुरू किया वह संघर्ष सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। किसान हितों को देखते हुए प्रस्तावित अवाप्ति को समाप्त करने की मांग के समर्थन में मैंने अवाप्ति प्रभावित प्रत्येक गांव में सभाएं की। उक्त मांग पर किसानों को संगठित कर दिसम्बर, 1982 में अवाप्ति के खिलाफ  लूनकरणसर में दो हजार किसानों ने काले झंडों के साथ जुलूस निकाला और अवाप्ति को समाप्त करने की मांग की।
इस अवाप्ति को रद्द करवाने के लिए मैं प्रजा-समाजवादी पार्टी के नेता मधु दंडवते व भाजपा के संसदसदस्य जसवंत सिंह के नेतृत्व में तत्कालीन रक्षामंत्री अरुण सिंह से मिला। जिसके फलस्वरूप एक सिंचित गांव फलेजी को अवाप्ति से मुक्त करने की गजट विज्ञप्ति जारी हुई, लेकिन 33 बारानी गांवों की अवाप्ति कायम रही।
किसानों का संघर्ष सन् 1982 से 1985 तक चला। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किसानों ने राजस्थान उच्च न्यायालय में दो अन्य रिट याचिकाओं के साथ एक रिट याचिका मामराज गोदारा, प्रधान पंचायत समिति के नाम से रिट याचिका प्रस्तुत कर अवाप्ति को चुनौती दी गई। किसान प्रतिनिधियों द्वारा राजस्थान उच्च न्यायालय में रिट फाइल की गई। याचिका के पक्ष में 28.05.1985 को यथास्थिति के आदेश पारित किये गये। लेकिन 18.10.1985 को उच्च न्यायालय द्वारा जारी इस यथास्थिति आदेश को निरस्त किया गया। जिन तीन किसान प्रतिनिधियों द्वारा जो रिट याचिका उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की गई थी, उन्हीं किसान प्रतिनिधियों ने एक विशेष अनुमति याचिका उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत कर एक बार पुन: गुहार लगाई।
राजस्थान उच्च न्यायालय में रिट याचिका प्रस्तुत करने के कारण ही 18.10.1985 को एडवोकेट जनरल ने उच्च न्यायालय का ध्यान राज्य सरकार के एक हलफनामे 17.10.1985 की ओर आकर्षित किया, जिसमें यह कहा गया था कि देश की सीमा पर सुरक्षा की गंभीर परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अवाप्त की जाने वाली भूमि की सख्त आवश्यकता है।
दिनांक: 18.10.1985 को एडवोकेट जनरल ने किसानों के हितों में उच्च न्यायालय में यह कहा कि महाजन तोपाभ्यास क्षेत्र की जो भूमि अवाप्त की जा रही है, उस भूमि को 10 प्रतिशत राशि की बजाय 30 प्रतिशत राशि विस्थापित परिवारों को संतोष राशि (सोलेशियम) के तौर पर दी जायेगी। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि धारा 4 की विज्ञप्ति 02.11.1983 को जारी होने की तारीख से 12 प्रतिशत ब्याज मुआवजा निर्धारण के दिन तक का दिया जायेगा।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात जो कही गयी वह यह थी कि विस्थापित परिवारों को बेदखल किये जाने से पूर्व भूमि अवाप्ति अधिनियम के द्वारा प्रोविजनल मुआवजे का चुकारा कर दिया जायेगा।
राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा उपरोक्त निर्णय 18.10.1985 को दिये गये और उसके बाद 34 गांवों के करीब 75 किसान प्रतिनिधि मेरे साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी से मिले और उनको विस्थापितों को कृषि भूमि सस्ती दर में पुन: आवंटित करने की मांग की गई।
यह ध्यान देने की बात है कि तत्समय भूमि अवाप्ति अधिनियम में सिर्फ  अवाप्त भूमियों का मुआवजा ही दिये जाने का प्रावधान था और विस्थापितों को पुन: स्थापित करने हेतु राज्य पाबंद नहीं था और न ही इस संबंध में कोई प्रावधान भूमि अवाप्ति कानून में या अन्य कानून में था।
किसानों के प्रतिवेदन पर ही हरिदेव जोशी ने अपने हाथ से जो नोटिंग्स की उसी के आधार पर महाजन तोपाभ्यास क्षेत्र के विस्थापितों का पुनर्वास करने के लिए राज्य सरकार ने 23.11.1985 को विज्ञप्ति जारी की। उक्त नियमों के द्वारा यह महत्त्वपूर्ण स्थापना पहली बार स्वीकारी गई कि अवाप्त भूमि के बदले उतनी ही भूमि अन्यत्र राज्य सरकार द्वारा विस्थापितों को दी जायेगी।
आवंटन नियमों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह कही गई है कि ‘विस्थापित परिवारों को उतनी ही भूमि आवंटित की जायेगी, जितनी भूमि विस्थापित गांव से उनसे ली गई है, लेकिन यह किसी भी हालत में सीलिंग सीमा से अधिक नहीं होगी।’
आवंटन नियमों में यह प्रावधान भी किया गया कि बीकानेर जिले की बारानी भूमियों व इंदिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र की सिंचित भूमियों व अनकमांड भूमियां, जो इंदिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र में है या उनसे बाहर है, उन्हें आवंटन के लिए उपलब्ध की जायेगी।
बारानी भूमियों के लिए उनसे 300 रुपये प्रति बीघा चार्ज किया जायेगा। यह ध्यान देने योग्य है कि विस्थापितों को मुआवजा 1200, 1400 व 1800 रुपये प्रति बीघा का दिया गया, लेकिन वापिस बारानी भूमि 300 रुपये बीघा में ही विस्थापितों को उपलब्ध करवायी गई।
इंदिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र के लिए यह प्रावधान किया गया कि दो बीघा अनकमांड या बारानी भूमि को इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में एक बीघा कमांड भूमि के बराबर माना जायेगा व इनके साथ यह भी कहा गया कि सिंचित और असिंचित भूमियां जो विस्थापित परिवार लेने के इच्छुक हैं, उनसे राजस्थान भूमि अवाप्ति अधिनियम के नियम 17 के तहत आरक्षित मूल्य चार्ज किया जायेगा।
23.11.1985 को जारी नियमों में विस्थापितों के पुनर्वास के लिए जो सहुलियतें दी गईं और आवंटन के जो अधिकार दिये गये, वे अधिकार महाजन तोपाभ्यास क्षेत्र के लिए सर्वोत्तम साबित हुए हैं।
उपरोक्त आवंटन के मूल अधिकारों में राज्य सरकार द्वारा सर्वप्रथम 15.01.1987 को 14 माह से कम अवधि में यह प्रतिगामी संशोधित आदेश जारी किये गये कि इंदिरा गांधी नहर परियोजना के प्रथम चरण में बारानी भूमियों के आवंटन पर रोक लगा दी, जबकि चक प्लॉन से बाहर कमांड/अनकमांड भूमियों के अलावा हजारों बीघा भूमि बारानी पड़ी थी।
इंदिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र के द्वितीय चरण में बारानी भूमि आवंटन न करने के आदेश राज्य सरकार द्वारा 13.03.1991 को प्रथम चरण की तरह ही जारी किये गये।
उक्त दोनों आदेश के फलस्वरूप इंदिरा गांधी नहर परियोजना के प्रथम चरण व द्वितीय चरण में जहां सी.ए.डी. चक प्लॉन के कमांड/अनकमांड क्षेत्र के बाहर पड़ी हजारों बीघा बारानी भूमियों के आवंटन पर रोक लगा दी गयी, यह रोक ना केवल पूर्णतया किसान विरोधी थी बल्कि 23.11.1985 की विज्ञप्ति द्वारा महाजन तोपाभ्यास क्षेत्र के विस्थापितों के लिए आवंटन नियमों के भी पूर्णतया विपरीत थी।
महाजन तोपाभ्यास क्षेत्र में 33 गांवों में मात्र बारानी भूमियां ही थी, जो अवाप्त की गई। इस क्षेत्र के किसान बारानी भूमि पर ही पीढिय़ों से खेती करते आ रहे थे और वे बारानी भूमि ही आवंटन में लेना चाह रहे थे, लेकिन उन्हें इससे वंचित कर दिया गया।
राज्य सरकार ने 28.08.1998 को महाजन तोपाभ्यास क्षेत्र के लिए नये आवंटन नियम जारी किये व उन नियमों को जारी करते समय विज्ञप्ति दिनांक: 29.11.1993 को अधिक्रमित किया गया।
28.08.1998 के नियमों की अव्यवाहारिकता व इन नियमों के तहत मात्र उन 112 विस्थापितों जिन्हें भूदान बोर्ड की भूमियां आवंटित होने के बावजूद कब्जा उन्हें प्राप्त नहीं हो सका था, केवल इस सीमित उद्देश्य से जारी किया गया था। इन नियमों में विस्थापित विरोधी यह निर्देश दिया गया कि उनके लिए बारानी भूमियों का आवंटन पूर्णत: बन्द है। पूगल तहसील व भूरासर माइनर के सीमित चकों पर 112 आवंटियों की समस्याओं का समाधान मात्र करने के लिए शेष आवंटन योग्य विस्थापितों की समस्याओं को पूरी तरह ओझल कर दिया गया। 28.08.1998 के नियमों में भी बारानी भूमियों के आवंटन पर रोक बदस्तूर जारी रही।
तत्कालीन उपनिवेशन मंत्री रामनारायण डूडी को 25.08.2006 को मैंने पत्र भेजकर नियमों की अव्यवाहारिकता को उजागर करते हुए यह मांग की थी कि काश्तकार नहरी भूमि की कीमत देने के तैयार नहीं है इसलिए 28.08.1998 के नियमों में जिन 40 काश्तकारों को आवंटन किया गया, वे सब अपना आवंटन पत्र लेने ही नहीं आये। मैंने पुरजोर मांग की बारानी भूमियों का आवंटन तुरन्त खोला जाये।
तत्कालीन उपनिवेशन मंत्री डूडी ने 28.08.1998 की अव्यवाहारिकता को समझा और विस्थापितों को राहत देने के लिए 14.06.2007 को आवंटन के नये नियम उन्होंने जारी किए।
उक्त नियमों में प्रावधान किया गया कि विस्थापित किसान इंदिरा गांधी कैनाल कॉलोनी के स्टेज द्वितीय में बारानी भूमि व कमांड/अनकमांड भूमियों को आवंटन करने के अधिकारी होंगे और बारानी भूमि की कीमत 540 रुपये प्रति बीघा ही चार्ज की जायेगी। उक्त नये नियम जारी होने के फलस्वरूप सन् 1991 में जो बारानी भूमियों का आवंटन इंदिरा गांधी कैनाल कॉलोनी की स्टेज द्वितीय में बंद किया गया वह 16 साल बाद उन्हें पुन: प्राप्त हो गया।
उक्त नियमों के तहत काश्तकारों को जो आवंटन हुआ उससे उन्हें 16 वर्ष बाद पहली बार बारानी भूमियां व्यापक पैमाने पर आवंटित की गयी और जो सक्षम थे उन्होंने कमांड/अनकमांड भूमियां आवंटित करवायी।
महाजन तोपाभ्यास क्षेत्र के संघर्ष के फलस्वरूप 23.11.1985 के द्वारा जारी किए गए उनमें वह सिद्वान्त पहली बार स्वीकार किया गया कि राज्य सरकार महाजन विस्थापितों को अवाप्त की गयी भूमि के बराबर अन्यत्र भूमि आवंटित की जा सकेगी।
23.11.1985 के जो नियम जारी किये गए, 16 महीने बाद ही उनमें इंदिरा गांधी नहर परियोजना प्रथम चरण में 15.01.1987 को व 13.03.1991 को इंदिरा गांधी नहर परियोजना के द्वितीय चरण में संशोधन कर बारानी भूमियों का आवंटन बंद कर इतनी छेड़-छाड़ की गयी कि 23.11.1985 के मूल नियम विकृत हो गये। शासन का मानस किसानों को बारानी भूमियों से वंचित करने का बना रहा। महाजन फील्ड फायरिंग रूल्स में किये गये संशोधन इस प्रकार अधिकांशत: असंवेदनशील, किसान विरोधी व अव्यवाहारिक सिद्ध हुए हैं।
इस विश्लेषण से स्पष्ट है कि 28.08.1998 के नियम पूर्णतया असफल रहे। क्योंकि उसके तहत एक भी आवंटन नहीं हो सका है। इन नियमों को निरस्त करने में सरकार को 9 वर्ष का समय लगा, जिसके बाद 14.06.2007 के नए आंवटन नियम जारी किए गए और बारानी भूमियों का आवंटन पुन: खोला गया।
संतोष की बात सिर्फ  इतनी ही है कि लम्बे संघर्ष के बाद 5,100 विस्थापित परिवारों में से करीब 4,800 किसान परिवारों को भूमि आवंटन किया जा चुका है।