भाजपा की हार का अंदेशा , ये भी एक कारण

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khabarthenews.com

जिस वक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने महात्मा गांधी की हत्या के आरोप के बाद राजनितिक क्षेत्र में कदम रखा तब जनसंघ की स्थापना की और उस का पहला चुनाव चिन्ह रोटी था। उसके बाद दीपक को लेकर जनसंघ आगे बढ़ा और आज कमल के चुनाव चिन्ह के रूप में भारतीय जनता पार्टी आज देश के 19 राज्यों समेत केंद्र की सत्ता में काबिज है।

भाजपा को यहां तक पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका उच्च जातियां और मूल OBC माना जाता है 2014 के चुनाव में जब भाजपा पहली बार खुद के बूते सत्ता तक पहुंची तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने 2024 और 2019 तक की योजना बनाई उसमें उनकी सोच थी कुछ उच्च जातियों और OBC के साथ और दलित वर्ग को भी साथ लिया जाए।

इसका मौका सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट के आरोपी को जांच के बाद गिरफ्तार करने का फैसला सुनाया। केंद्र को मौका मिला और SC/ST में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लोकसभा में लाकर संशोधित कर दलित वर्ग को अपना वोट बैंक बनाना चाहा लेकिन वह भूल गई कि जब रोटी दीपक और कमल का चुनाव चिन्ह था तब देश की कुछ जातियां और मूल OBC उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चली।

SC/ST एक्ट मैं संशोधन के बाद के बाद दलित वर्ग तो भाजपा के साथ दो से 4% ही जुड़ा लेकिन उनका मूल वोट बैंक उच्च जातियों में से 15 से 20 प्रतिशत तक सरक गया। वर्तमान के विधानसभा चुनाव में एक से 5 प्रतिशत उच्च जातियों की नाराजगी भाजपा को सत्ता से बेदखल कर रही है।

बात अभी ही खत्म नहीं हुई। आने वाले लोकसभा चुनाव में अगर इन जातियों को नहीं साधा गया तो मध्यप्रदेश राजस्थान जैसे हालात दिल्ली में भी बनेंगे उच्च जातियों का बड़ा वर्ग इस वक्त चुप्पी साधे हुए हैं लेकिन SC/ST एक्टमें संशोधन बिल के बाद उनके अंदर आग सुलग रही है जो शायद चिंगारी के रूप में भाजपा को राज्यों से लेकर और दिल्ली तक सत्ता से बेदखल कर दे।

वह दिगर बात है कि उच्च जातियां अपने दम पर किसी एक पार्टी की सरकार नहीं बना सकती लेकिन अपने दम पर किसी भी सरकार को गिराने का मादा रखती हैं। उच्च वर्ग भाजपा के इस खत्म को दगाबाजी से जुड़कर देख रहा है जिस तरह महाराष्ट्र में लंबे समय तक शिवसेना के साथ रहने के बाद जब भाजपा सरकार में आई तो संकट के साथी शिवसेना को ठोकर मार दी ठीक उसी तरह भाजपा जब अपने दम पर केंद्र में सत्ता में आई तो अपने मूल वोट बैंक उच्च जातियों को भी दरकिनार कर दिया।

पर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आजादी से आज तक दलित समाज की प्रगति किसी भी राजनीतिक दल ने गहराई से न तो देखी और ना करनी चाहिए SC/ST एक्ट में संशोधन कर उनके वोट बैंक को हासिल करने की हिमाकत तो राजनितिक दल कर रहे हैं लेकिन आज भी कुछ एक परिवारों को छोड़ दें तो आधे से ज्यादा दलित परिवार शोषण और गरीबी का जीवन जी रहे हैं।

दलितों को बराबरी का दर्जा और दलितों मैं भी दलित वर्ग को ऊपर लाना राजनैतिक दल और समाज दोनों की जिम्मेवारी है। 2 अप्रैल को जो घटना हुई वह राजनैतिक नहीं बल्कि राजनैतिक चेतना थी जिसे समाज और राजनीतिक दल दोनों को समझना होगा।

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