पिताजी को बता नही सकता कि अटलजी नही रहे : मानवेन्द्रसिंह

3489

जिन्ना-प्रकरण में पिता–जसवंतसिंह–को पार्टी ने निष्कासित किया तो अटलजी ही थे जिन्होंने उन्हें फोन किया। अटलजी मेरे पिता के मित्र थे, संरक्षक और मार्गदर्शक भी। स्नेह से बंधा मेरे पिता का यह अनोखा रिश्ता उस व्यक्तित्व के साथ था जिन्हें भारत अटल बिहारी वाजपेयी के नाम से जानता है।

अस्वस्थ होते हुए भी अटलजी ने मेरे पिता के निष्कासन पर अपना गुस्सा और तकलीफ जाहिर की, उखड़े मन से अटलजी ने तब पिता को जो कहा उसे सार्वजनिक करना उचित नहीं समझता। अस्वस्थता के चलते ही प्रगाढ़ मित्रता ही वजह थी कि अटलजी और जसवंतसिंहजी–दोनों के मन में समान दु:ख और भावनाएं बसती थींं।

पिताजी अक्सर कहा करते थे कि भारतीय राजनीति में अटलजी और आडवाणीजी की जैसी दोस्ती मैंंने अन्यत्र नहींं देखी। इतने लंबे समय तक एक-दूसरे पर भरोसा और पारदर्शी मित्रता–शीर्ष भारतीय राजनीति में दूसरा उदाहरण दुर्लभ है। राजनीति में बदलते रिश्तों के इस दौर में वैचारिक प्रतिबद्धता और परस्पर समझ से प्रसूत ये रिश्ता सुख-दुःख और कई इम्तिहानों से गुजरते छह दशकों कायम रहा, तब भी टिका रहा जब पार्टी में ही प्रतिद्वंद्वी खेमा ABV और LKA संबोधन की आड़ में तंज करने से नहीं चूकता, ऐसे झंझावातों के बीच भी अटलजी और आडवाणीजी ने आपसी भरोसे पर आंच नहीं आयी। इस अदभुत पोलिटिकल पार्टनरशिप को भारत की राजनीति ने देखाहै।

मेरे पिता, जो इन दोनों से बिल्कुल अलग सामाजिक पृष्ठभूमि, परवरिश और विचार से आए थे, बावजूद इसके वाजपेयीजी के साथ उनकी मित्रता भी अंत तक रही। अस्वस्थता के चलते दोनों भले ही पिछले चार वर्षों से एक दूसरे से मिल नही पाये लेकिन मित्रता के सूत्र की भूमिका आडवाणीजी ने बखूबी निभाई, आडवाणीजी अकेले ऐसे शख्स हैं जो जब-तब अपने दोनों पुराने मित्रों से मिलने आते थे। उनकी इन मुलाकातों में आडवाणीजी की आंखों में आया पानी तीनों की भावनाएं एक-दूसरे के चेतन-अवचेतन तक पहुंचाए बिना नहीं रहता।

अटलजी और मेरे पिताजी की भिन्न पृष्ठभूमि को देखते हुवे यह मित्रता आश्चर्य से कम नही मानी गई। वाजपेयीजी ग्वालियर के एक शिक्षक परिवार से थे और मेरे पिता मालाणी (बाड़मेर) के सामंती परिवार से; वाजपेयीजी की शिक्षा सरकारी स्कूल कॉलेज में हुई, मेरे पिता देश के नामी बोर्डिंग स्कूल मेयो में पढ़े; पिताजी अंग्रेजी माध्यम से तो वाजपेयीजी एकदम खांटी हिंदी बैकग्राउंड से; ऐसी क्या समानता थी कि ये रिश्ता 40 वर्ष तक अटूूट बना रहा।

हांं, एक ग्वालियर कनेक्सन को समझ सकते हैं, पिताजी और वाजपेयीजी के रिश्ते की कड़ी सरदार आंग्रे थे। सार्वजनिक क्षेत्र की एक पहेली सरदार आंग्रे पिताजी के रिश्ते में साढू थे। आंग्रे ने पिता को जब वाजपेयी से मिलवाया, तब इस मुलाकात के कोई राजनैतिक मायने नही थे। मेरे पिता और वाजपेयी अक्सर मिलने लगे। आर्य समाजी रहे वाजपेयी आरएसएस विचार से पोषित होकर जनसंघ के माध्यम से सार्वजनिक जीवन मे आये। पिताजी तब नेशनल डिफेंस एकेडमी में केडेट थे, दोनों की उम्र में एक दशक से ज्यादा अंतर था।

उस दौर में पिताजी सी राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी के विचार ने प्रभावित हुए। खुली आर्थिक नीतियां और नागरिक जीवन में शासन का न्यूनतम हस्तक्षेप उनकी वैचारिक अवधारणा बन गई थी। वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने तो कई आर्थिक सुधारों की वजह मेरे पिता का यह वैचारिक आग्रह था।

वाजपेयीजी और मेरे पिता की मित्रता की अन्य वजह थी साहित्य और किताबों के प्रति दोनों का अगाध प्रेम। इस तरह से सामान्य स्नेह धीरे-धीरे एक मजबूत बौद्धिक रिश्ते में तब्दील हो गया। इस मायने में यह रिश्ता वाजपेयी और आडवाणी के रिश्ते से भिन्न और अनोखा था। एक ही विचारधारा से आने वाले अटलजी और आडवाणीजी से अलग पिताजी को इस लिहाज से आउट साइडर माना जाता था।

मित्रता की प्रगाढ़ता बनाये रखने और निभाने का श्रेय वाजपेयीजी को ही जाता है। आज ऐसे माहौल में जब कुछ लोगों का मानना है कि देशभक्ति का उनका ब्रांड ही श्रेष्ठ ओर वैध है और बाकी वालो का अवैध तब वाजपेयीजी दूसरों से अलग खड़े नजर आते हैं, उनके व्यक्तित्व की बौद्धिक उदारता की वजह से अनेक लोग पार्टी से जुड़े। अफसोस कि पार्टी से यह दुर्लभ गुण उनके साथ ही चला गया। अपने सहयोगियों को काम करने की वे पूरी आजादी देते थे, शायद इसी वजह से आज़ाद-खयाल मेरे पिता को विनोद में उनका हनुमान कहा जाता था। ये उपमा शायद उड़कर बार-बार चेनई जाने और जयललिता को मनाने के कारण मिली, दूसरा कारण था अपने बॉस और मेंटोर वाजपेयी के भरोसे के चलते मेरे पिता अनेक मंत्री समूहों (GOM-Group of Ministers) का चेयरमैन होना। पुराने फोटोग्राफ और वीडियो फुटेज भी इसके गवाह हैं।

पिछले चार वर्षों से सेना और मेडिकल साइंस ने शानदार तरीके से मेरे पिताजी की देखभाल की और स्वास्थ्य का ध्यान रखा है, हालांकि वे बहुत ही कम प्रतिक्रिया देते हैं। उनकी प्रगाढ़ मित्रता ही मुझे अटलजी की सूचना देने से रोक रही है कि यह सुन कर वे अपनी बची-खुची चेतना भी कहीं खो न दें, यह वो खतरा है जिसे उठाने का सामर्थ्य मुझ में नहीं है।

इसे विडम्बना ही मानना चाहिए कि पूरी दुनिया को मालूम है कि वाजपेयीजी नही रहे लेकिन उनका एक निकटतम मित्र इससे अनभिज्ञ है।____________________________

(पूर्व सांसद और शिव से वर्तमान विधायक मानवेन्द्रसिंह वित्त, विदेश एवं रक्षामंत्री रहे जसवंत सिंह के पुत्र हैंं। उनके मूल अंग्रेजी में लिखे इस आलेख का अनुवाद राजेन्द्रसिंह भींयाड़, बाड़मेर ने किया है)

अपना उत्तर दर्ज करें

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.