सत्ता का खेल तो चलेगा…सरकारें आएंगी-जाएंंगी…पार्टियां बनेंंगी बिगड़ेंंगी…मगर यह देश रहना चाहिए…इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए

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मई 1996 में अपनी सरकार के विश्वास मत के प्रस्ताव पर बोलते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई द्वारा कही उक्त पंक्तियां 16 अगस्त से पहले शायद ही कभी सोशल मीडिया पर इस तरह वायरल हुई हो ।
भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर 16 अगस्त को जिस ढंग से देश भर से प्रतिक्रिया आई यह पूरे देश की सामूहिक भावन की अभिव्यक्ति थी । एक राजनेता से बढ़कर स्टेट्समैन के निधन से हुई अपूर्णीय क्षति का दर्द था। लम्बे समय बाद किसी नेता के निधन के दुःख में पूरा देश शरीक हुआ।

बीबीसी से जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ की फेसबुक वॉल पर उदृत ये पंक्तियां

“एक ख्वाब था जो अधूरा रह गया।
एक गीत था जो गूंगा हो गया
एक लौ थी जो अनन्त में विलीन हो गई
ख्वाब था एक ऐसे संसार का जो भय और भूख से मुक्त होगा
गीत था एक ऐसे महाकाव्य का जिसमे गीता की गूँज और गुलाब की महक थी।
लौ थी एक ऐसे दिए की जो ता रात जलता रहा, हर अँधेरे से लड़ता रहा
और वो हमे रास्ता दिखाकर निर्वाण को प्राप्त हो गया।

मृत्यु ध्रुव है, शरीर नश्वर है। वे उस वक्त चले गए जब मानवता को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। प्रखर और प्रभावी वाणी हमेशा के लिए मौन हो गई जिसे सुनने को जमाना उत्सुक और प्रतीक्षारत रहता था। हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गई।

भारत माता आज शोकमग्न है। मानवता आज खिन्नमना है, उसका पुजारी जो चला गया।
शांति आज अशांत है। उसका रक्षक चला गया। जन जन की आंख का तारा ओझल हो गया। दलितों का सहारा छूट गया। यवनिका पात हो गया।

दिन : 29 मई ,1964 का, स्थान : संसद भवन
खुद वाजपेयीजी के ये शब्द जैसे उन्ही को समर्पित हो गए हो। उक्त पंक्तियां वाजपेयीजी के उस मार्मिक भाषण का हिस्सा है जो देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू के निधन पर संसद में दिया गया था।

अटल जी सर्वसमावेशी भारतीय राजनीति के अपनी तरह की पीढ़ी के अंतिम प्रतिनिधि थे जिन्हें सभी दलों के नेता अपना समझते थे, इसीलिए बार बार उन्हें अजातशत्रु कहा गया ।
पंडित नेहरू का स्नेह पाने वाले अटलजी इंदिरा गांधी से लेकर बाद के सभी प्रधानमंत्रियों और प्रमुख नेताओं के साथ दोस्ताना सम्बन्धों के गवाह रहे।

लम्बे समय तक भारतीय संसद में वक्तृत्व कला की छाप छोड़ने वाले अटलजी ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन मे किसी विरोधी पर भी व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाए।
संघ के स्वयंसेवक बनने से पहले कम्युनिस्ट पार्टी की स्टूडेंट विंग से जुड़े रहे अटलजी भारत छोड़ो आंदोलन में जेल भी गए । वकालत की पढ़ाई अपने पिता के साथ पूरी करते हुए संघ सरसंघचालक गुरुजी के विशेष स्नेह के चलते जनसंघ के संस्थापक सदस्य रहे और फिर डॉ. मुखर्जी के सहयोगी के रूप में राजनीतिक जीवन आरम्भ करने वाले अटलजी ने लगातार 10 बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के सदस्य के रूप में 50 साल तक संसद सदस्य रहकर रिकॉर्ड कायम किया।

अटल जी को याद करने की बहुत सारी वजह हैं, जिनमें उनकी कविताएं, उनके साहसिक निर्णय, उनकी संवेदनशीलता उनकी कश्मीर नीति, गठबंधन सरकार चलाने की काबिलियत , पड़ौसी पाकिस्तान से दोस्ताना सम्बन्ध कायम करने की कोशिशेंं और इन सबसे बढ़कर इंसानियत।

2003 में जब वे कश्मीर गए और कश्मीर के अलगाववादी संगठनों ने संविधान के दायरे में रहकर बात करने से इंकार कर दिया तो जम्हूरियत, कश्मीरियत और इंसानियत पर बात करने का उनका आह्वान से बड़ा साहस क्या हो सकता है । पाक के साथ सम्बन्धों को लेकर आखिरी वक्त तक उम्मीद में रहे अटलजी, नवाज शरीफ से लेकर सेना प्रमुख के रूप में कारगिल युद्ध के जिम्मेदार परवेज मुशर्रफ के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी आगरा शिखर वार्ता में वे यह चाहते थे कि कश्मीर समस्या का हल निकले।

दिल्ली से लाहौर बस चलाने का उनका फैसला भी कम साहसिक नहीं कहा जा सकता। हम पड़ोसी बदल सकते हैं लेकिन भूगोल नहीं–यह बात कह कर उन्होंने जिस सच्चाई को स्वीकार किया और कश्मीर समस्या को सुलझाने और पाक के साथ मित्रता बढ़ाने का अपने संकल्प को अमली जामा पहनाने की जुगत में डटे रहे, यद्यपि वह असफल रहे लेकिन आज भी कश्मीर के लोग उन्हें इस रूप में याद करते हैं कि किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने उनकी समस्या को सही ढंग से समझा और सुलझाने की दिशा में कोई काम किया तो वे वाजपेयी थे।
कुछ माह पहले जब मैं नागालैंड गया था तो वहां के एक राजनेता ने भी अटलजी को इसी रूप में याद किया कि 1962 में नागालैंड के भारत में विलय के बाद कोई प्रधानमंत्री ऐसे आए जिन्होंने नागालैंड की समस्या को समझा तो वेे अटल बिहारी वाजपेई ही थे। यही बात उन्होंने दूसरे भारतीय प्रधानमंत्रियों से अलग खड़ा करती है।

जनता पार्टी से अलग होकर जब भाजपा की स्थापना हो रही थी तो अटल बिहारी वाजपेयी ही थे जिन्होंने गांधीवादी समाजवाद के मॉडल को पार्टी के लक्ष्य के रूप में जोड़ा। यह अपने आप में बड़ी विचित्र बात थी परंतु उस पर अटल रहे और अपने ही सहयोगियों के विरोध के बावजूद उन्होंने पार्टी के संविधान में इस उद्देश्य को जुड़वाया।

वाजपेई की सोच का केनवास बड़ा था इसीलिए गठबंधन की सरकार चलाते हुए उन्होंने अपने सभी सहयोगी दलों को विश्वास में लेकर सहमति से शासन चलाया। इतना ही नहीं धुर विरोधी कांग्रेस को भी वाजपेयी अपने करीब पाते रहे।

जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री रहते हुए हिंदी में दिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में उनके भाषण को सारे भारतीयों में गर्व की भावना भर दी । उनके साहसिक निर्णय में हम पोकरण परीक्षण को भी याद कर सकते हैं जब पूरे विश्व के ताकतवर देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद अटलजी डटे रहे और भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों की कतार में शामिल कर दिया । कारगिल वार में उनके नेतृत्व में जिस तरह से भारतीय सेना में विश्वास भरा और पूरा देश विपक्ष सहित सरकार के साथ आ खड़ा हुआ । ऐसा ही भरोसा इंडियन एयरलाइंस की विमान अपहरण के समय और भारतीय संसद पर हुए आतंकी हमले के समय दिखा।

अटल जी के निधन से भारतीय राजनीति में एक उदार और सौम्य युग का अवसान हुआ है जिसकी भरपाई मौजूदा परिवेश में कम ही नजर आती है।

अटलजी को श्रद्धाजंलि देते हुए उनकी ही मौत पर लिखी कविता की चार पंक्तियां साझा करूँगा।
ठन गई, मौत से ठन गई
मौत की उम्र क्या है, दो पल भी नहीं
जिंदगी सिलसिला आज कल का नहीं
मैं जी भर जिया मैं मन से मरूं
लौट कर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं

–सुरेंद्रसिंह शेखावत, बीकानेर

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