मूल्यों के खयाल के साथ राजनीति करने वाले अशोक गहलोत ‘भोले’ हैं ना ‘भोंदू’

2587

गुजरात चुनाव के बाद से अशोक गहलोत कांग्रेस की केन्द्रीय राजनीति की चर्चाओं में हैं। वहीं 2019 के चुनावों के बाद की बात करने वालों में से कईयों का यह मानना है कि किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत न मिलने की स्थिति में विपक्षी सहमति के लिए कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री के तौर पर राहुल के बाद दूसरे नाम की जरूरत पड़ी तो वह अशोक गहलोत का हो सकता है। जिन्हें ऐसा दूर की कौड़ी लगता है, उन्हें पिछली सदी के अन्तिम दो दशकों की केन्द्रीय राजनीति को खंगाल लेना चाहिए।

फिलहाल हमें राजस्थान के सन्दर्भ से बात करनी है, क्योंकि 2019 से पहले है 2018, जिसके अन्त में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के साथ राजस्थान विधानसभा के चुनाव होने हैं। प्रधानमंत्री मोदी के नजरबंदीय करिश्मे के बावजूद राजस्थान में भाजपा की हालत कुछ ज्यादा ही खस्ता है। सुनते हैं खुद सरकार के खुफिया विभाग ने मात्र 39 सीट का आंकड़ा देकर पार्टी के हर छोटे-बड़े नियंता का चैन छीन लिया है। खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह अपना डेरा यहीं डालने की सोचने लगे हैं।

अचम्भा तो यह है कि इस सबके बावजूद राजस्थान का मुख्य और एकमात्र विपक्षी दल कांग्रेस इतमीनान से है। प्रदेश पार्टी अध्यक्ष सचिन पायलेट किस जुगत में रहते हैं, पता नहीं चलता। अच्छे डिबेटर और सुलझे हुए नेता होने के बावजूद पायलेट भीड़ से भय खाते नजर आते हैं, प्रदेश भर से पहुंचने वाले कार्यकर्ताओं के बीच भी वे अपने को सहज नहीं पाते तो फील्ड में उनसे क्या उम्मीद करें। जबकि राजस्थान की जनता आगामी विधानसभा चुनाव में अगर भाजपा को नकारती है तो मुख्यमंत्री होने की संभावना पायलेट की ज्यादा लगती है बावजूद इसके पार्टी उनको मुख्यमंत्री के तौर पर घोषित कर चुनाव शायद ही लड़े, ऐसा करके अशोक गहलोत से जनता की उम्मीदों को वह खत्म नहीं करना चाहती है। कांग्रेस हाइकमान यह भी जानती है कि राजस्थान में गहलोत के नाम के बिना चुनाव में जाना जोखिम भरा है।

कई पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक जो ये कहते हैं कि अशोक गहलोत तीसरी बार सूबे के मुख्यमंत्री बनने की फिराक में हैं, उन्हें गहलोत के तखमीने से अवगत हो लेना चाहिए। दूसरे प्रदेशों के नेता का तो पता नहीं लेकिन राजस्थान में अशोक गहलोत आजादी बाद सार्वजनिक जीवन में आने वाले अकेले ऐसा नेता हैं जिनका ना तो पुख्ता जातीय आधार है, ना वे किसी राजनीतिक घराने या सम्पन्न परिवार से हैं। बावजूद इस सबके स्वनिर्मित छवि के आधार पर मात्र 29 वर्ष की उम्र में हर तरह की कसौटी पर दुरूह जोधपुर सीट से लोकसभा के लिए ना केवल चुनकर गये बल्कि पहली ही बार में केन्द्र में मंत्री भी बने।

मकसद विशेष से चुने किसी भी कॅरिअर में उत्तरोत्तर तरक्की की आकांक्षा को गलत नहीं कहा जा सकता, वह भी तब जब कोई उसके लिए पूरी तरह डिजर्व करता हो, गहलोत पर यह बात फिट बैठती है। इस संदर्भ में पहले यहीं बताया एक प्रसंग पुन: दोहरा देता हूं—पिछले वर्ष 3 जनवरी 2017 की बात है, एक निहायत निजी लम्बी बातचीत में राजस्थान में राजनीति में अपनी भूमिका के प्रसंग में गहलोत ने कहा था कि ‘देखिए, हमारे कांग्रेस में कल्चर है कि आप काम करते रहो, जो डिजर्व करते हो वह मिलेगा।’ तब गहलोत गुजरात में चुनाव पूर्व की तैयारियों में लगे थे और पारिवारिक कारणों से जयपुर आए हुए थे। उनके इस नैष्ठिक भाव का ही नतीजा था कि मोदी-शाह के गुजरात के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को लगभग सफलता मिली। इसके बाद से ही लगातार लुंज-पुंज होती पार्टी में उनकी जरूरत को समझा गया और एक तरह से सांगठनिक दारमदार पार्टी ने उन्हीं पर छोड़ दिया है।

जो गहलोत को जानते हैं वे ये भी अच्छे से समझते हैं कि गहलोत की पार्टी में वर्तमान जिम्मेदारी परिवार की उस गृहिणी जैसी है जो अपने शिशु का मोह त्याग घर के अन्य जरूरी काम निबटाने में लग जाती है। यह राजस्थान गहलोत के लिए गृहिणी के उस शिशु से कम नहीं है जहां प्रत्येक जिला-तहसील स्तर तक के कार्यकर्ताओं से इनके ‘नाम-पुकारू’ रिश्ते हैं। चूंकि पार्टी गहलोत के लिए घर-परिवार से कम नहीं है, पार्टी के इन हालातों में राजस्थान की सत्ता को वे पार्टी से ऊपर तरजीह देंगे, नहीं लगता। 2019 के लोकसभा चुनावों और उसके बाद भी कांग्रेस को गहलोत जैसे चतुर और कर्मठ नेता की जरूरत है, वे खुद इसे अच्छे से समझते भी होंगे। कर्नाटक विधानसभा और हाल ही के चार लोकसभा और दस विधानसभा उपचुनावों के परिणामों से बन रही उम्मीदों के बाद मोदी विरोधी एकजुटता की जरूरत वैसी ही महसूस की जा सकती है जैसी आपातकाल के बाद कांग्रेस विरोधी एकजुटता की महसूस की गई थी। ऐसे में केन्द्रीय राजनीति में अशोक गहलोत की भूमिका की संभावना ज्यादा दिखती है।

राजस्थान के साथ उन्हें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम को भी देखना है, ऐसे में मुख्यमंत्री के तौर पर बिना किसी का नाम आगे किए ही यहां चुनाव लडऩा पार्टी के हित में होगा, ऐसा गहलोत भी मानते-समझते होंगे, इसमें दो राय नहीं। सार्वजनिक बयानों में गहलोत कब क्या कहते हैं और पार्टी प्रभारी और पायलेट क्या कहते हैं, यह सब उनके सामने प्रस्तुत प्रश्न और परिस्थितियों पर निर्भर करता है, इनके किसी भी कहे पर कयास लगाना पत्रकारों का पेशा है और राजनीतिक विश्लेषकों की जरूरत। ऐसे में जो अभी नकारात्मक बातें करते हैं, वे गहलोत को अंडर एस्टीमेट ही कर रहे हैं।
दीपचन्द सांखला
31 मई, 2018

अपना उत्तर दर्ज करें

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.