भीतर ही भीतर टुकड़े होता भारत और मीडिया की संकीर्णता

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मेघालय की राजधानी शिलांग में वर्षोंं से बसे दलित सिखों और स्थानीय जनजाति के बीच संघर्ष की स्थिति के बाद तनाव बढ़ा हुआ है। पंजाबी कॉलोनी को बाहर करने की बरसों पुरानी मांग अब तेज हो गई है।

एक जनजाति युवक और सिख महिला के ताजा झगड़े के बाद वहां के हालात विकट बने हुए है। हमारे मुल्क में स्थानीय बनाम बाहरी का विवाद अलग अलग राज्यों में समय समय पर संघर्षों का कारण बनता रहा है। कभी महाराष्ट्र में शिवसेना और मनसे बिहारियों को बाहर निकालने की मांग करते हैंं तो कभी दिल्ली में नॉर्थ ईस्ट के लोगों को हिंसा का शिकार बनाया जाता है।

दक्षिण भारतीय राज्यों में उत्तर भारतीयों का विरोध तो कभी नार्थ ईस्ट में मारवाड़ियों की खिलाफत, दूसरे राज्यों में कश्मीरी युवकों पर हमले तो कभी पंजाब में गैर पंजाबियों का विरोध निरन्तर चलता रहता है।

एक ही देश के नागरिक होने के बावजूद अलग क्षेत्रीय पहचान के कारण घृणा और नफरत का भाव हमारी राष्ट्रीय एकता की भावना को कमजोर करता है।

“पंजाब केसरी” के सम्पादक और सांसद अश्विनी चौपड़ा अपने आज के संपादकीय में ‘घायल हुए मेघालय’ लिखकर मेघालय में हाल ही के पंजाबी-जनजाति के आपसी संघर्ष को मुखरता के साथ राष्ट्रीय एकता के लिए संकट बता रहा हैं, मेरी जिज्ञासा है कि क्या वे इसी मुखरता से पंजाब में गैर पंजाबियों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार पर भी लिखेंगे!

कभी हम एक भारत की बात करते हैंं तो कुछ लोग इससे बढ़कर अखण्ड भारत की कल्पना भी करते हैंं परंतु दूसरी तरफ क्षेत्रीयता के आधार पर हम दूसरे सूबे के लोगों को नापसंद करते हैंं, वह भी इस हद तक कि यह घृणा और नफरत समय समय पर हिंसक हो जाती है। जब तक हमारे मन में जाति, सम्प्रदाय, रंग, लिंग और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव रहेगा, तब तक हिंदुस्तान को सहेज कर एक कैसे रख पाएंगे।।

–सुरेन्द्रसिंह शेखावत
राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता
बीकानेर

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