बीकानेर का गंगा राजकीय संग्रहालय : कितना सार्वजनिक-कितना सामन्ती

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‘राजकीय संग्रहालय’ यदि है तो उसमें इतिहास एक-पक्षीय नहीं हो सकता, मगर बीकानेर स्थित ‘गंगा राजकीय संग्रहालय’ में बहुत निर्ममता से उस एक पक्ष को उपेक्षित किया गया है जो उन दिनों के सामंतीकाल में देश को अंग्रेजों से मुक्त करवाने के लिए अपने प्राण दे रहे थे।

बीकानेर के इस संग्रहालय में तत्कालीन सामंती शासक गंगासिंह का यशोगान तो है पर उसी काल मे इसी शासक द्वारा प्रताड़ित किये गए स्वतन्त्रता सेनानियों का कोई जिक्र नहीं है। जबकि उस वक्त इन सेनानियों का निर्मम दमन गंगासिंह ने अमानवीयता की पराकाष्ठा पर जा कर किया गया था।

बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानियों पर दाऊदयाल आचार्य की पुस्तक से है पता चलता है कथित महाराजा मन, प्राण और वचन से अंग्रेजों को समर्पित थे।

संग्रहालय में स्वतंत्रता सेनानियों के पक्ष को नजरअंदाज करना निजी संग्रहालय को तो अधिकार देता है, मगर ‘राजकीय’ को नहीं।

बीकानेर में एक पूरी पीढ़ी थी जो देश के क्रांतिकारियों के साथ कदम से कदम मिला कर अंग्रजों का गांधीवादी तरीके से प्रतिरोध कर रही थी और तिरंगा लहराते ‘महाराजा’ के प्रकोप का शिकार हो रही थी।

इन राष्ट्र-प्रेमियों को उस सामंती काल मे हिटलरी करतूतों से अमानवीय और अकल्पनीय यातनाएं दी गईंं।

‘राजकीय’ है इसलिए यह संग्रहालय सार्वजनिक और समग्रता मूलक हो, तकाजा यही है।

–अनिरुद्ध उमट, साहित्यकार

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