फर्क अच्छे बुरे का है जेण्डर का नहीं – #मी टू कैम्पेन

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साभार-श्रुति गौतम

वो भी लड़के ही थे जिन्होंने अपनी फुल स्पीड एनफील्ड बाइक पर सवार होकर तेज़ आवाज़ में मेरे कानों में लगभग चीखते हुए मेरी स्कूटी का बेलेंस बिगाडऩे में कोई कमी नहीं छोड़ी और वो भी लड़के ही थे जिन्होंने मेरे स्कूटी का पॉवर स्टार्ट काम न करने पर बिना मदद मांगे भी सामने से रुक कर किक मार कर स्कूटर स्टार्ट करवाया और थैंक यू सुनने का इंतज़ार करे बगैर ही लौट गए। वो भी लड़के ही थे जिन्होंने किसी बस के सफऱ में पास बैठकर बदतमीजी की सब हदें पार कर दी और वो भी लड़के ही थे जिन्होंने भरी बस में सिर्फ अकेले मुझे खड़े हुए देख बेहद शराफत से अपनी सीट दी। वो भी लड़के ही थे जिन्होंने ऑफिस में लेट होने पर ‘आजकल तो लड़कियां चाँद पर जा रही है, मैडम। दिल्ली-मुंबई में तो बारह-एक बजे तक लड़कियां आराम से घूमती है।’ कह कर मजाक बनाया और वो भी लड़के ही थे जिन्होंने ऑफिस की फील्ड विजिट में लेट हो जाने पर ड्राइवर को चार बार ताकीद की कि मेम को घर के बाहर तक छोड़ कर आना। https://khabarthenews.com

लड़की उन पहले वाले लड़कों को खूब लानत भेजती है और दूसरे वाले लड़कों को खूब दुआएं क्योंकि बेसिकली महज लड़का होना ही बुरा होने का पर्याय नहीं है और न ही सिर्फ लड़की हो जाने से ही कोई बिचारी हो जाती है। सारा मसला अच्छे-बुरे के बीच का है। और अच्छाई और बुराई बाकी तमाम गुणावगुणों की तरह जेंडर न्यूट्रैल होती है।

बाकि #metoo का तो यूं है कि हो सकता है ‘किसी’ शरीफ लड़के ने किसी लड़की की वजह से कभी suffer किया हो मगर लगभग ‘हर’ लड़की ने किसी लड़के की वजह से कुछ-न-कुछ सहा जरूर है। इस अंतर को समझिये। ये कोई अच्छी बात तो है नहीं। अच्छा बस इतना है कि कहने की हिम्मत जुटा पा रही है। कहने दीजिए। सही-गलत का निर्णय समय को करने दीजिए।

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