नीलाभ मिश्र की स्मृति, पत्रकारिता पर पी. साईंनाथ : आयोजन पर एक टीप

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कल हैबिटाट सेंटर के भव्य सभागार में हाल में हमसे बिछुड़े सम्पादक नीलाभ मिश्र की स्मृति में पालागुम्मी साईंनाथ का व्याख्यान सुनना अपने आप में यादगार अनुभव था। उन्होंने पत्रकारिता (जिससे ‘मीडिया’ को उन्होंने जुदा कर देखना चाहा) के पतन पर लिखने वालों, अख़बारों, प्रतिष्ठानों, उद्योगपतियों आदि के नाम तक बताते हुए ‘कंटेंट’ के व्यापारिक प्रयोजनों में झूल जाने को पुख़्ता उदाहरणों के साथ उजागर किया।

उन्होंने किसानों, शिक्षा-स्वास्थ्य, पानी और जन-सरोकार के अन्य विषयों के लोप के साथ वेज बोर्ड, पत्रकारों के बरक्स पीआर करने वालों की अख़बारों में आवाजाही की चर्चा भी की। प्रेस की आज़ादी कैसे ‘पर्स’ की आज़ादी में तब्दील हो गई है, इसे साबित किया।

शुजात बुख़ारी का हत्या की बात करते हुए साईंनाथ ने कहा कि पत्रकार आए दिन मारे जा रहे हैं, पर अंगरेज़ी के नहीं भाषाई अख़बारों के। अख़बारों में दलित नगण्य हैं, मुख्य उपसंपादक के पद पर तो शायद एक भी न मिले।

सभागार खचाखच भरा था, हालाँकि उनमें दिल्ली के अभिजात जन ज़्यादा थे। बाहर तने परदे के सामने बैठ सुनने वाले भी कम न थे। एक संजीदा, शरीफ़, ईमानदार और सरोकारी पत्रकार की याद में साईंनाथ का बोलना वाजिब और माफ़िक़ था।

लेकिन दो बातें अखरीं। पहली बात तो आयोजकों को मैं पहले कह चुका। दूसरी के लिए सुबह बात न हो सकी। पहली यह कि मूलतः हिंदी के पत्रकार के लिए साईंनाथ बोलें यह अच्छा था; पर अध्यक्षता निवेदिता मेनन की जगह क्या हिंदी का लिखने-बोलने वाला कोई बुद्धिजीवी, लेखक, शिक्षक नहीं कर सकता था?

दूसरी बात: राहुल गांधी को वहाँ क्यों बुलाया गया? उनकी शान बढ़ाने के लिए? कि देखिए साईंनाथ को सुनते जाते हैं, बुद्धिजीवियों के बीच मौजूद हैं होनहार? इसलिए कि नीलाभ कांग्रेस के प्रकाशन गृह के प्रधान सम्पादक थे?

सम्भवतः दूसरा कारण ही रहा होगा, पर इससे–मेरी नज़र में–नीलाभ की स्मृति आहत हुई होगी। राहुल गांधी की फूहड़ सुरक्षा व्यवस्था से भी, जिसने सभागार पर कमोबेश क़ब्ज़ा कर डाला था। भट्टा परसौल में बीस किलोमीटर पैदल चलने वाले राहुल को अध्यक्ष बनते ही बुद्धिजीवियों के बीच इतना ख़तरा अनुभव होने लगा? और देखिए, वे अध्यक्ष के बोलने से पहले उठ भी चले।

जो हो, राहुल गांधी की मौजूदगी ने नीलाभ के कांग्रेस के किसी प्रतिष्ठान में होने की बात को अकारण उभारा जिसका कोई औचित्य न था। आख़िरी दिनों की मजबूरी की नौकरी जीवन भर के काम और कमाई पर इस क़िस्म की देनदारी नहीं बन सकती। नीलाभ कभी कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता नहीं थे।

मेरे और मित्र भी नेशनल हेरल्ड में हैं। पर मैं उन्हें उनके पिछले काम के कारण जानता हूँ। पार्टी के अख़बार-पोर्टल आदि के काम से उनकी छवि नहीं बनाता। हालाँकि उनके लिखने और बाहर मंचों पर बोलने पर ग़ौर करता हूँ, ट्वीट तक पर। उनकी असल परीक्षा तब होगी जब, देर-सेबर, अगर कांग्रेस सत्ता में आई। पर तब तक वे वहाँ टिकें, न टिकें!

दरअसल, कांग्रेस हो चाहे भाजपा (रामबहादुर राय से हिंदुस्थान समाचार को जिलाने की तैयारी चल रही है) या कोई अन्य राजनीतिक दल, परोक्ष-अपरोक्ष उनके धन/निर्देशन/संरक्षण/प्रोत्साहन में होने वाली “पत्रकारिता” उन संस्थागत स्वार्थों का एक आयाम ही है, जिसकी ओर साईंनाथ ध्यान दिला रहे थे।

जुझारू सम्पादक नीलाभ की वह छवि नहीं बननी चाहिए, जो राहुल गांधी का आना-जाना, अनचाहे सही, बना गया। उन्हें कम-से-कम अब हम ऐसे घेरों से बाहर ही रखें।
–ओम थानवी, पत्रकार (फेेेसबुक पोस्ट)

फोटो : न्यूजटाइम

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