खाजूवाला विधानसभा क्षेत्र का गांव बल्लर : जरूरतों पर एक नजर

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ग्रामीण इलाकों की हालत ही खाजूवाला विधानसभा क्षेत्र का वास्तविक प्रतिबिम्ब है। लगातार पिछड़ रहे खाजूवाला विधानसभा क्षेत्र के विभिन्न पहलुओं पर नजर डालना जरूरी है।

आखिर क्या है इस पिछड़ेपन का कारण? आइये हम खाजूवाला विधानसभा क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों  पर विचार करके कुछ समस्याओं से रूबरू होते हैं। आज हम बात करते हैं बल्लर गांव की…बल्लर अन्तरराष्ट्रीय लाइन से मात्र 12 किमी. दूरी पर स्थित है। लेकिन इस गांव कि समस्याएंं इतनी व्यापक है कि यहां के ग्रामीण अभावोंं में ही अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

गांव की प्रमुख समस्याएंं

बीएडीपी योजना से वंचित

बल्लर गांव अन्तरराष्ट्रीय सीमा से मात्र 12 किमी दूरी पर स्थित है बावजूद इसके बीएडीपी जैसी बड़ी योजना से इस गांव को दूर रखा गया है। लेकिन वहीं सीमा से 35 किमी दूर दन्तौर बीएडीपी योजना से जुड़ा हुआ गांव है। जैसा कि गांव वाले बता रहे हैं कि बल्लर ग्राम पंचायत के प्रतिनिधियों और स्थानीय विधायक की आपसी खींचातान के कारण इस गांव को बीएडीपी योजना से वंचित रखा गया है। इसके चलते यहां की जनता में रोष व्याप्त है। ग्रामीणों ने इसे अपने हकोंं पर कुठाराघात बताया है।

पेयजल की विकट समस्या
वैसे तो खाजूवाला विधानसभा क्षेत्र के लगभग सभी गांवों में पेयजल कि स्थिति दयनीय है। बल्लर भी इस समस्या से लगातार जूझ रहा है। इस गांव में पेयजल के लिए डिग्गियों की व्यवस्था तो है लेकिन इन डिग्गियों में पानी कि मात्रा कम और कचरा ज्यादा है। इन डिग्गियों में पानी कि सप्लाइ करने वाली मेन डिग्गी का तल जमीन में धस गया जिसका कारण निर्माण मेटेरियल की कमी बताया जा रहा है। मेन डिग्गी का तल जमीन में धसने के कारण पानी पूरी तरह से सप्लाइ नहीं हो पाता है, दूसरा कारण सप्लाइ पाइप बहुत छोटा है इस कारण भी पानी सही तरह से सप्लाइ नहीं हो पाता।

इन डिग्गियों में इतनी गंदगी है की जल पीने लायक नहीं है। ग्रामीण अधिकतर इसी जल को प्रयोग में लाते हैं और बीमारियोंं को आमंत्रण देते हैं। इन हालात में पेट, यकृत, त्वचा और गुर्दों की बीमारियां जन्म लेती हैं।

शिक्षा व्यवस्था
कहने को तो यहां बारहवीं तक का विद्यालय है लेकिन स्टाफ की कमी के चलते यहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या बहुत कम है। स्टाफ की कमी तो है ही, फर्नीचर भी पर्याप्त नहीं है जिसके चलते बच्चों के माता-पिता बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए दन्तौर या खाजूवाला के निजी संस्थानों में भेजना पड़ता हैं। निजी संस्थानों की फीस मंहगी होने तथा अप डाउन का खर्चा इतना बढ़ जाता है जिसके कारण ग्रामीणों को भारी कर्ज लेना पड़ता है इसीलिए ज्यादा गरीब परिवार तो अपने बच्चों को उच्च शिक्षा नहीं दिला पाते। स्थानीय विधायक और सांसद चाहेंं तो उनके एक आदेश पर इस बड़ी समस्या का निदान हो सकता है।

चिकित्सा व्यवस्था
इस गांव कि चिकित्सा व्यवस्था इतनी लचर है कि यहां के लोग झोला छाप डॉक्टरों पर निर्भर हो चुके हैं। कुछ समय पहले यहां एक नर्स लगाई गई थी लेकिन गांव वालों के अनुसार वो नर्स अब यहां नहीं है बल्कि उसने 0 आरडी में रहना शुरू कर दिया।

जिप्सम खनन से यहां प्रदूषण बढ़ गया है जिसके चलते यहां अनेक बीमारियों ने घर कर लिया है। स्थानीय लोगों ने कई बार प्रशासन को इस समस्या से अवगत भी करवाया लेकिन अभी तक कोई सुधार नहीं हुआ। यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि यहां की विधायक एक डॉक्टर हैं बावजूद इसके क्षेत्र में चिकित्सा व्यवस्था बहुत ही लचर है।

पशु चिकित्सा की एक ब्रांच यहां मौजूद है लेकिन दवाईयों के अभाव में वो भी ना होने के बराबर है। पिछले दिनों भेड़ बकरियों में फैली बीमारी के चलते दवाईयों के अभाव में सैकड़ों जानवर मर गये।

सरकारी योजनाओं की पूरा लाभ नहीं मिल रहा

सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाएं पूर्ण रूप से इस गांव में नहीं पहुंच पा रही, चाहे वो बीपीएल योजना हो या नरेगा जैसी केन्द्रीय सरकार की योजना। नरेगा योजना काफी समय से बंद बताई जा रही है। राशन के लिए गांव वालों को भटकाना पड़ता है। ऐसी और भी कई योजनाएं हैं जो अभी तक पहुंच भी नहीं पायी।

आवारा पशुओं का जामवाड़ा

ग्रामीणों कि एक बहुत बड़ी समस्या यह भी है कि यहां आवारा पशु बहुत ज्यादा हैं जिसके कारण फसलों को तो नुकसान पहुंचता ही हैं, पीने के पानी की किल्लत के चलते इन पशुओं का हाल भी बुरा है। नजदीक में कोई गोशाला तक नहीं है।

प्रतिनिधियों की अनदेखी

इस गांव में जन प्रतिनिधियों की अनदेखी लगातार रही है। चुनाव के समय यहां एक दो बार ही विधायक देखे गये। सांसद को तो ज्यादातर ग्रामीणों ने रूबरू देखा तक नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार खाजूवाला प्रधान द्वारा उनका पूरा ख्याल रखा गया है। प्रधान कोटे से पांच लाख की सड़क बन कर तैयार हो चुकी है। एक वाटरकुलर लगवाया गया है। विद्यालय में शौचालय बनवा दिया गया है और हाल ही के दिनों में मैदान के लिए भी पांच लाख की घोषणा भी की गई है।

खाला डाट कवरिंग का अभाव

यहां के किसानों कि सिंचाई पानी के साथ साथ खाला डाट कवरिंग की बड़ी समस्या है। धूल भरी आंधियों के चलते खाले रेत से भर जाते हैं जिनसे बार-बार मिट्टी निकालनी पड़ती है। खाला कवरिंग के लिए किसान कई बार प्रशासन को निवेदन चुके हैं, बावजूद इसके स्थिति जस की तस है।

हमने यहां खाजूवाला क्षेत्र के गांव बल्लर की कुछ ज्वलन्त समस्याओं पर विचार किया है । समस्यायें तो और भी कई हैं । उनके निदान के लिए ग्रामीणों और पंचायतों को आगे आना होगा । स्थानीय विधायक और सांसद की प्रकट व परोक्ष भूमिका की दरकार भी है।

स्थानीय विधायक की उदासीनता और पार्टी में आपसी खींचतान के चलते बल्लर गांव आज भी विकास की राह ताक रहा है।
~मुनशफ बलौच

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