कभी-कभार : अशोक वाजपेयी

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कविता का काम रिकार्ड रखना नहीं है, पर वह किसी भी समय में मनुष्य होने का हिसाब ज़रूर रखती है
कविता मनुष्यता की सहज सहचर है जो हिंसा और हत्या की शैली के खिलाफ निडर खड़ी रहती है

कुछ शब्द, कुछ गीत

इसमें जगाते हैं कुछ मानवीय

वे हमारी जीभ के नोंक पर घंटों ठहरे रहते हैं

जैसे हमारी आंख की कोर में बूंद

जो बहने से इनकार करती है

ये पंक्तियां तुर्की के प्रसिद्ध कवि तुगुल तानयोल की हैं. उन्होंने कविता के अलावा आलोचना और निबंध भी लिखे हैं. वे मर्मरा विश्वविद्यालय में सामाजिक विज्ञान के अध्यापक हैं. शायद ही कहीं ऐसा होता होगा कि कवि कविता से ही अपनी जीविका कमाता हो. भारत ही नहीं अमरीका, यूरोप में भी कवि अपनी आजीविका के लिए कुछ न कुछ करते हैं. तुर्की में पिछले कुछ बरसों से, भारत की ही तरह, कट्टरता बढ़ी है. तानयोल के बारे में कहा जाता है कि वे अंधी विचारधारणात्मक वफ़ादारियों के प्रति सजग कवि रहे हैं. वे गीतिपरक कवि हैं पर शास्त्रीय स्पष्टता और सहज मानवीयता की लौ जलाये हुए हैं. जिनके यहां मानवीय होने की रोशनी है. जिसमें हम सब, एक तरह से, सत्यापित होते हैं.

कविता का काम रिकार्ड रखना नहीं है. पर वह अपने अाप में और अपनी तरह से किसी भी समय में मनुष्य होने का हिसाब ज़रूर रखती है. आक्‍तावियो पाज़ ने उसे ‘दूसरा इतिहास’ बताया था. उसमें दर्ज़ होता रहता है- अनायास मनुष्य होने का अर्थ और दर्द. यह दावा किया जा सकता है, जैसा कि अमरीकी आलोचक इर विंग हाव ने दशकों पहले द्वितीय महायुद्ध के बाद किया था कि संस्कृतियां मनुष्य के साथ विश्वासघात कर सकती हैं पर साहित्य ने कभी ऐसा नहीं किया है. मनुष्यता के कठिन से कठिन समय में कविता मनुष्य की सहचर रही है. आज भारत में हिंदुत्व के नाम पर एक सर्वथा हिंदू-विरोधी आंदोलन, हिंसा और हत्या की शैली अपनाकर, भारतीय परंपरा और संविधान दोनों की अवमानना करता हुआ, सत्ता-बल से अपना वर्चस्व स्थापित करने में लगा है. कविता उसके विरोध में साहस से निडर खड़ी है. यही उसकी अपनी परंपरा है. इसके लिए, यह नोट किया जाना चाहिये कि उसे किसी आंदोलन या विचारधारा की ज़रूरत या सहारा नहीं है. कविता मनुष्यता की सहज सहचर है. कई बार साहित्य ही अपने समय का सच्चा जनतंत्र होता है. अनंत के संविधान का, स्वतंत्रता-समता-न्याय के नगर का नागरिक.

मार्क्स-200

इसमें कोई संदेह नहीं (क्योंकि यह अकाट्य सचाई है) कि संसार के स्तर पर चिंतन, सृजन, आर्थिक व्यवस्था, राजनैतिक व्यवहार, संस्कृति आदि क्षेत्रों पर पिछले लगभग डेढ़ सौ वर्षों में जिस एक विचारक का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है, वह कार्ल मार्क्स हैं. उनके विचार से साम्यवाद का राजनैतिक आंदोलन चला और विचार तथा सृजन में मार्क्सवाद का. पहला धीरे-धीरे धूमिल हो गया पर दूसरा अभी भी सशक्त और सक्रिय है. पहले में आयी विकृतियां, नरसंहार, हिंसा, अन्याय आदि ने साम्यवाद को बेहद बदनाम किया. इसने मार्क्सवाद की स्थिति को भी काफ़ी प्रतिकूल ढंग से प्रभावित किया है पर वह ध्वस्त नहीं हो पाया है. उससे असहमति बढ़ी है, गहरायी है पर वह विचार और सृजन के क्षेत्र में हाशिये पर नहीं गया है.

मनुष्य की मुक्ति के हमारे समय में दो महान स्वप्न देखे गये हैं. मार्क्स और गांधी ने वे देखे. दोनों ही स्वप्नों ने अनेक मुक्ति-संघर्षों को प्रेरित किया. संसार की अनुदार राजनीति जिस तरह से विकसित हुई है, उसमें दोनों ही स्वप्न अप्रासंगिक क़रार दिये गये हैं. मार्क्स और गांधी दोनों में कई बुनियादी अंतर हैं. पर दोनों में किसी न किसी तरह की नैतिकता राजनीति, आर्थिकी को संयमित करने के लिए ज़रूरी तत्व थी. दुर्भाग्य से, इस समय सारी राजनीति और अर्थतंत्र इस क़दर प्रबंधन का मामला हो गया है कि उसमें किसी महास्वप्न की छाया तक ब़ाकी नहीं रही हैं. साहित्य, कलाएं और विचार बिना स्वप्नशीलता और कल्पना के, बिना गहरे नैतिक बोध के संभव नहीं हैं. इसलिए वे, भले मार्क्सवादी या गांधीवादी न भी हों, संसारव्यापी राजनीति और आर्थिकी के विरोध और प्रतिरोध में हैं. इसके अपने अतिचार हैं पर वे राजनीति और अर्थतंत्र के अतिचारों के सामने लगभग नगण्य हैं.

मार्क्स की अनेक भविष्यवाणियां सही साबित नहीं हुईं. पर उनकी सामाजिक व्याख्याएं, शोषणहीन समाज बनाने की अवधारणाएं ऐसी हैं जो आज भी हमारी समझ को पैना करती हैं. संसार में तेज़ी से बढ़ता बाज़ारवाद और नवपूंजीवाद भी अपने अनिवार्य प्रतिफलों में मार्क्स की कई अवधारणाओं से बेहतर समझ जा सकता है. मार्क्स का चिंतन यूरो-केन्द्रित था और उसमें अन्य समान्तर ज्ञान-मीमांसाओं का ज़रा भी ख़याल नहीं किया गया. यह वैचरिक स्तर पर उसकी बड़ी सीमा रही है. लेकिन यह स्थिति मार्क्स को लेकर ही नहीं है. फ्रॉयड के बारे में भी यह सही है.

सही है कि मार्क्स का महास्वप्न एक दुस्‍स्‍वप्न में विकृत हुआ, बदल गया. तो सही यह भी है कि भारत का गांधी-स्वप्न भी बिलकुल हाशिये पर ढकेल दिया गया है. महास्वप्न शायद अन्ततः मानवीय सचाई को पूरी तरह से बदल नहीं पाते पर वे उसे बदलने की जिजीविषा और साहस उपजाते हैं. मार्क्स ने यह किया और उनके 200 वर्ष होने पर मनुष्यता को उन्हें कृतज्ञतापूर्वक एक महान स्वप्नदर्शी और परिवर्तनकारी विचारक के रूप में याद करना चाहिये.

शेष कथा

ऐसे लेखक होते हैं जिन्हें आभास हो जाता है कि उनके पास अब कहने को कुछ नहीं बचा. पर ऐसे भी बहुत होते हैं जिन्हें पता ही नहीं चलता कि उनके पास कुछ शेष नहीं है. दोनों ही अपने समापन पर पहुंचते हैं. पर उसमें से शायद ही कोई ऐसा कुछ लिखता हो जिसे साहित्यिक वसीयतनामा कहा जा सके. सिर्फ़ अज्ञेय की एक कविता वसीयत याद आती है, जो कुछ इस तरह की कही जा सकती है और जिसे उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम दिनों में लिखा था. उससे पहले निराला की अंतिम कविता: ‘पत्रोत्‍कण्ठित जीवन का विष बुझा हुआ है’.

कुछ और उदाहरण याद किये जा सकते हैं जब लेखकों को लगा कि अब उनके पास कुछ कहने को शेष नहीं है. अपनी मृत्यु के दो महीने पहले जोसेफ़ कानराड ने आन्द्रे ज़ीद को लिखा था कि मैंने लगभग चार बरसों से क़ायदे का कुछ नहीं लिखा, क्या यह अंत है? विलियम फॉकनर ने स्वीकार किया था कि मैं जानता हूँ कि मैं अंत की ओर जा रहा हूं. संगीतकार चायकोवस्की ने अपनी मृत्यु के नौ दिन पहले अपनी छठवीं सिम्फ़नी की रचना पूरी की. जिसे करते समय वे खुश थे कि उनके दिवस का अवसान नहीं हुआ है. क्‍लोद राय ने फेंफड़ों के कैंसर का आपरेशन होने के बाद हर रोज़ कविता लिखना शुरू किया. उनकी कुछ पंक्तियां थीं:

क्यों, ऐसा समय आयेगा

जबकि हर चीज़ आखि़री बार के लिए होगी।

काफ़का ने लिखा था- तुम मृत्यु के बारे में अंतहीन बात करते हो और तुम मरते नहीं हो. आन्द्रे ज़ीद ने अपने अंतिम काल में बार-बार यह जिज्ञासा की थी कि क्या उनके पास कुछ और कहने को शेष है, वे अपने कहे हुए में कुछ और जोड़ सकते हैं? उन्होंने विनोद भाव से यह भी कहा था कि मेरी योजना इतना बूढ़े होने की नहीं थी.

चेखव ने अपने एक एकांकी को नाम दिया था ‘हंसगीत’. उसमें एक बूढ़ा अभिनेता कहता है: ‘‘मैं एक निचोड़े हुए नीबू, एक दरकी बोतल की तरह हूंं. मैं एक मूर्ख बूढ़ा आदमी हूं, एक लड़खड़ाता बूढ़ा. मैं विदूषक की भूमिका निभा सकता हूं और बड़ी-बड़ी बातें बघार सकता हूं. जवान होने का छद्म कर सकता हूं. पर सचमुच मेरा जीवन समाप्त होने को है- मैंने बोतल ख़त्म कर दी है, सिर्फ़ तल में कुछ बूंदें बची हैं, तलछट’’. आलबेयर काम्यू ने अपने उपन्यास ‘दि फ़र्स्ट मैन’ के बारे में अपने नोट्स में दर्ज़ किया था कि यह ‘पुस्तक अपूर्ण रहेगी’. थोड़े ही दिनों बाद कार से कुचले जाने से उनकी मृत्यु हो गयी.

काफ़का ने लिखा था- ‘फिर भी मैं मरने जा रहा हूं. मैं अपना अंत गा रहा हूं. एक व्यक्ति का गान थोड़ा लंबा हो सकता है, दूसरे व्यक्ति का कुछ छोटा. पर अन्तर कुछ शब्दों से अधिक का नहीं होता.’ फ्रेंच रोजर ग्रेनिए की पुस्तक ‘पैलेस आफ बुक्स’ में ऐसे बहुत सारे मार्मिक प्रसंग दिये गये हैं जिन्हें इधर मैंने बहुत उत्साह से पढ़ा-गुना.

(साभार : सत्याग्रह.कॉम)

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