एलिवेटेड रोड : कोटगेट यातायात समस्या का समाधान–अंत पंत यही है

2712

बीकानेर शहर की फिलहाल सबसे बड़ी समस्या दो रेल फाटकों के चलते कोटगेट क्षेत्र का बार-बार जाम होता यातायात है जिसके एलिवेटेड रोड से समाधान पर सूबे की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने इस कार्यकाल के पहले वर्ष में ‘सरकार आपके द्वार’ के तहत 2014 के जून के उत्तरार्द्धी पखवाड़े में जब यहां रही, अपनी सहमति दे दी थी। जून 2018 में राजे की उस सहमति को चार वर्ष पूरे हो रहे हैं। तब से यह शहर चकवे पक्षी की मुद्रा में एलिवेटेड रोड रूपी स्वाति नक्षत्र की उस बूंद को मुंह बाये ताक रहा है।

इन चार वर्षों में जब भी इस समाधान पर बात होती है, शहर कांग्रेस बायपास का राग अलापने लगती है। वहीं महात्मा गांधी रोड के कुछ व्यापारी विरोध में आ खड़े होते हैं तो प्रतिक्रिया में कुछ भाजपाई एलिवेटेड रोड के समर्थन में! इस बीच शहर के संतोषी बाशिंदों को बहलाने के लिए राज्य सरकार इस छोटी-सी योजना के लिए केन्द्र सरकार के परिवहन मंत्रालय के आगे हाथ पसार गुहार लगाती है और केन्द्र सरकार का परिवहन मंत्रालय भी ‘ले सवा लख’ की मुद्रा में अपनी दातारी दिखा देता है। वसुंधरा सरकार के इस छोटे लोभ ने शहर के उन ऐसों को अपनी शेखी बघारने का अवसर दे दिया जिन्हें इस शहर के हित अपने तरीके से साधने की सनक हो। तरीका व्यावहारिक है या नहीं उन्हें उससे मतलब नहीं। राज्य सरकार अपने 2 लाख 12 हजार करोड़ रुपये के वर्ष 2018-19 के बजट में यदि बीकानेर की इस एलिवेटेड रोड हेतु मात्र 135 करोड़ का भी प्रावधान कर देती तो हाइकोर्ट कम-से-कम इस बहाने तो इसे उलझाता नहीं।

ठीक इसी तरह एलिवेटेड रोड के वर्ष 2006-07 के नक्शे में उसकी चौड़ाई उतनी ही बढ़ाते जितने से, दोनों तरफ के किसी दुकान-मकान में टूटा-भांगी की आशंका नहीं होती तो योजना क्षेत्र के व्यापारियों के विरोध का हाव इतना नहीं खुलता, जितना अभी खुला है। इसे 12 मीटर विद पेव्ड सोल्डर तक बढ़ाने की जरूरत नहीं है। क्योंकि सघन बसावट के बाद हर शहरी क्षेत्र में यातायात बढ़ने का एक चरम बिन्दु होता है जिसके हिसाब से बिना कैसी भी टूट-भांग के जितनी चौड़ी एलिवेटेड रोड बन सकती है, इस क्षेत्र के भविष्य के यातायात के लिए भी वह पर्याप्त होती। लेकिन राज का राजा कौन? कोई समझाए तो समझने को भी तैयार नहीं! लोभ में एन एच ए आई का घोचा डलवाया, अब तो लगता है एलिवेटेड रोड की चौड़ाई बढ़ाने का मकसद भी यही था कि सरकार को काम ना करने का बहाना मिल जाये!

इन सब रुकावटों को साधने का काम जनप्रतिनिधि कर सकते हैं। लेकिन अपने जनप्रतिनिधियों के ऐजेंडे में शहर की इस समस्या का समाधान ना कभी पहले वालों में था न अभी वालों में है। अपने सांसद अर्जुनराम मेघवाल की ऊठ-बैठ जिनके बीच रही है, उनसे इन्होंने चाहे कुछ और सीखा या नहीं, वे इतना जरूर सीख गये हैं कि बळती में हाथ नहीं देना है और यह भी कि मारो-मारो करते रहो पर मारना एक को भी नहीं है।

बीकानेर पूर्व की विधायक सिद्धिकुमारी जनप्रतिनिधि का धर्म निभाने को चुनाव कभी लड़ती ही नहीं, राज के रुतबे को भोगने के लिए लड़ती हैं और जनता अपनी खम्मा घणी मानसिकता में उन्हें जिता भी देती है। सिद्धिकुमारी को इस शहर के लिए कुछ करना तो दूर की बात, शहर की चिन्ता में कुछ सोचना भी ना पड़ जाय, इसलिए यहां कभी रहती भी नहीं हैं।

रही बात बीकानेर पश्चिम के विधायक गोपाल जोशी की तो सिद्धिकुमारी की तरह ही वे भी राज के रुतबे के लिए ही चुनाव लड़ते हैं। एक बार वे डॉ. बीडी कल्ला के नाकारापने से जीत लिये तो दूसरी बार जनता को मोदी द्वारा भरमाये जाने से। कोटगेट क्षेत्र की यातायात समस्या के समाधान पर तो उनकी स्थिति बेगम अख्तर की गायी दाग दहलवी की इन पंक्तियों से अच्छे से समझ सकते हैं–
खूब परदा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं,
साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं!
ऐसे में कहें कि इस शहर का ‘राम’ ही मालिक है या इस शहर का कोई धणी-धोरी है ही नहीं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी!

इस सब का लबो-लुआब यह है कि सूबे में भाजपा की वसुन्धरा सरकार चार वर्षों तक इस शहर के लिए कुछ ना करते हुए भी करते हुए का स्वांग कर बहलाती रही और अपनी पारी लगभग पूरी खेल ली है। लगभग तीन महीने बाद चुनावी आचार संहिता लग जानी है और उसके पेटे कुछ ना कर पाने की लाचारी दिखाने का सरकार को बहाना भी मिल जाना है। चुनाव बाद सरकार किसी की भी आये उसका रंग-रूप बदला हुआ होगा। नई सरकार तक शहर की बात फिर से पहुंचाने में समय लगेगा। सरकार भाजपा की आयी तो देर-सबेर यही कवायद फिर शुरू होगी और कांग्रेस की आई तो बन्द गली के आखिरी मकान पर रेल बायपास जा के खड़ा हो लेना है। हालांकि जो संभव नहीं है उसकी संभावना भी कभी ना कभी खत्म होगी ही-इसमें दस लगे या बीस वर्ष, तब तक शहर को अपने अति-संतोषी होने का दण्ड कोटगेट क्षेत्र के जाम में भुगतते रहना है।

अब भी जिन्हें लगता है कि इस समस्या का समाधान रेल बायपास है, उन्हें 6 अप्रैल 2017 का ‘बायपास के बहाने एलिवेटेड रोड का विरोध करने वाले बीकानेर के शुभ चिन्तक हैं या शहर के खिलाफ साजिश में शामिल?’ आलेख को और जिन्हें लगता है अण्डर-पास समाधान है तो उन्हें 17 जून 2015 के ‘कोटगेट-सांखला फाटक : समाधान के लिए एकमत से सक्रिय होने का यही समय’आलेख का ‘रेल अण्डरब्रिज’खण्ड एक बार पढ़ लेना चाहिए। ये दोनों आलेख deepsankhla.blogspot.com पर उपलब्ध हैं।
–दीपचन्द सांखला
14 जून, 2018

अपना उत्तर दर्ज करें

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.