आईपीएल की तर्ज पर मुहल्ले का बीपीएल : एक रिपोर्ट

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बीकानेर। ‘आईपीएल नहीं बीपीएल’ यानी ‘बाड़ी प्रीमियर लीग’ (बीकानेर के एक मुहल्ले माजी-सा की बाड़ी का लघुरूप) यह टूर्नामेंट हमारे मुहल्ले में रियासत कालीन नवलसागर कुएँ के ‘टेनिस मैदान’ के जर्जर हो चुके प्रांगण में शाम के वक्त तीन चार दिन तक चला। परिसर में पुरातन इमात, उस में पातालतोड़ कुआँ, टेनिस मैदान, टेबल टेनिस हॉल, बैडमिंटन कोर्ट हुआ करते थे और बगल में ही सूख झड़ चुका स्वीमिंग पुल भी है।

ऐसे ऐतिहासिक स्थल पर यह स्वप्रेरित आयोजन था। जिसमें कई सहयोगी जरूरत अनुसार जुड़ते गए, वे स्पॉन्सर कहलाए।जैसे एक चित्र में परचून की दुकान में बैठे मुस्काते नरू को आप देख सकते हैं, यह गेंदों के पैसे कम पड़ने पर सहायक था। मैदान के इर्दगिर्द के घरों के ऊपर से बड़ी लाइटों की व्यवस्था भी किसी सहृदय ने की। बच्चों ने मैदान खुद साफ किया।आयोजन का बैन उपलब्ध करावने वाला स्पॉन्सर के दर्जे से सम्मानित हुआ। मैदान के कोने पर कमेंटेटर बॉक्स की तर्ज पर टेन्ट हाऊस की मेजों पर कमेंटेटर ‘स्पॉन्सर’ माइक सिस्टम पर लाइव कमेंट्री…..’ये शानदार अपील और अंपायर का हाथ ऊपर उठता हुआ’….इतना सुनते ही दीवारों पर बैठे दर्शकों का गगनभेदी शोर उठता है और एक दो बम फोड़े जाते हैं, दर्शकों में सभी उम्र के, बालक, महिलाएं भी।

18 टीमो की एंट्री के साथ हुए इस टुर्नामेंट के फाइनल की शाम का दृश्य है। हेलमेट, पैड्स, ग्लब्ज जैसे बोझ वाले व्यर्थ उपकरण वहां नहीं दिखे। स्ट्राइक पर के बल्लेबाज से जब कई गेंदों के बाद भी रन नहीं बन रहा था तो नॉन स्ट्राइक का बल्लेबाज उसे पिच के बीच बुला कुछ कहता है, फिर हाथ से हाथ मिलाते अपने एंड्स की ओर। मुझे लगता है कुछ छक्के इतने गगनचुम्बी थे कि गेंद शायद ही मिली हो। पूरा मोहल्ला गूँज रहा था। मुझे तस्वीर लेते देख दर्शक उसी तरह कैमरे की ओर उमड़े जैसे टीवी पर आईपीएल में उमड़ते हैं। इन्हींं रास्तों-जगहों के बीच से कभी मैंने अपने जीवन के जाने कितने साल स्कूल जाते, खेलने जाते, फ़िल्म देखने जाते, कुआँ देखने, टेनिस खेलते स्मार्ट लोगों को देखते…गुजारा…कभी कभी सूनी दोपहर में भूत से डरते छुपना, कभी कभी गमले चुराना।

चीज़ें बहुत बदल गई हैं।

पर ये दीवानापन देख अपना बचपन याद आया ऐसा ही।
अचानक बारिश आने लगी तो खिलाड़ी-दर्शक सब भागने लगे इधर उधर….जो बैनर दीवार पर टँगा था उसे उतार कमेंटरी मेज पर बिछाया गया, ग्राउंड्स ब्यॉय द्वारा।

मैं तेज-तेज घर की गली की ओर लपका।

मेरे अलावा किसी ने मैदान नहीं छोड़ा था। एक जमाने में ऐसे ही जाने कितनी आँधी-बारिश में भी मैदान पर डटे रहने के दिन याद आए। बारिश बीकानेरी थी । कुछ मिनटों बाद सिर्फ भीगी मिट्टी की गंध थी और था एक चहकता महकता सामूहिक आवाज़ों का खुशी भरा शोर…मैच फिर शुरू हो चुका था ये इस बात का संकेत था। पता नहीं बारिश के दखल के कारण अंपायर ने (जो एक ही था) डकवर्थ लुइस नियम का सहारा लिया या नहीं।

अगली शाम मैं फिर उधर से गुजरा…. एक दो बच्चे थे।
कल को याद करते मैदान से चाहत निभाने हमारे ही उन बचपन के दिनों की तरह आ गए थे।

 –अनिरुद्ध उमट, कवि-कहानीकार

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